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    नास्तिकतावादियों के लिए तमाचा है यह अमृतकुंभ !

    This is the stomach of the Amritakumbh atheists!
    भगवान सूर्यनारायण के रात्रि में २ बजे मकर राशी में संक्रमण करते ही प्रयागतीर्थ पर प्रथम अमृतस्नान का दिन निकला । भोर ३.३० बजे सभी आखाडों के शिविरों में अमृतस्नान की दृष्टि से नागा, संन्यासी, बैरागी, दिगंबर, महंत इत्यादि की भागदौड आरंभ हुई । सनातन के शिविर में भी हम सुबह ३.३० बजे उठकर ४ बजे संतों के स्वागत के लिए तैयार हो गए थे । आखाडों के सभी संत-महात्मा देवनदी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम पर अमृतस्नान करनेवाले थे । हम सुबह महानिर्वाण आखाडे में पहुंचे, तब सभी स्नान के लिए सज्ज साधुआें को आराध्य देवता के सामने पुष्पमालाआें से सजाया जा रहा था और भस्मधारणविधि द्वारा भस्म लगाया जा रहा था ।  
         सुबह ७ डिग्री तापमान में भी यह साधू-महंत लंगोटी में थे अथवा नग्न थे । उन्हें ठंड का भान ही नहीं था । सुबह वे सभी नग्न थे परंतु कहीं भी अश्‍लीलता नहीं थी । शरीर को भस्म लेपकर हाथ में गदा, तलवार, त्रिशूल इत्यादि पारंपरिक शस्त्र धारण कर सभी साधू अमृत की अनुभूति देनेवाले स्नान के लिए सिद्ध हुए थे ।      
    आखाडों का राजशिष्टाचार !
         प्रधानमंत्री, राष्ट्र्रपति इत्यादि के दौरे के समय कौन आगे जाएगा और कौन पीछे रहेगा, यह जैसे निश्‍चित होता है, वैसे ही आखाडों में भी आगे, बीच में और पीछे कोैन खडा रहेगा, इसका क्रम निश्‍चित होता है । उसमें एक प्रकार से अनुशासन का कठोरता से पालन किया जाता है । आखाडों में भी कोैन प्रथम स्नान करेगा, द्वितीय स्नान करेगा, यह सबकुछ निश्‍चित होता है । यह सनातन परंपरा अव्याहत रूप से आज भी चल रही है, यह विशेषतापूर्ण है ।    
    संतों के स्वागत की सनातन परंपरा 
         संतों का स्नान निर्विघ्न रूप से संपन्न हो, इसलिए प्रशासन और पुलिस-सेना कार्यरत हुई थी । पुलिस और अर्धसैनिक बल की लगभग ८० टुकडियां त्रिवेणी संगम क्षेत्र में कार्यरत थीं । हमने पत्रकार के रूप में महानिर्वाणी आखाडे के जत्थे के साथ त्रिवेणी संगम की ओर प्रस्थान किया, तब त्रिवेणी मार्ग पर सनातन संस्था के साधकों ने हाथों में हार्दिक स्वागत के फलक और झंडे लेकर संत-महंतों का स्वागत किया । ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष और ‘जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम’ का जयघोष यह इस स्वागत की विशेषता थी । हम प्रातः ५.३० बजे कडाके की ठंड में संगमतीर्थ पर पहुंचे, तब मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालू उनके स्वागत के लिए खडे थे । एक पुलिस ने बताया कि रात्रि १२ बजे से ही लाखोें लोग संतों का अमृतस्नान देखने के लिए एकत्रित हुए हैं । इतनी ठंड होते हुए भी वे बडी श्रद्धा से त्रिवेणी संगमतीर्थ पर मार्ग के दोनों ओर खडे थे । साधू-संतों का स्वागत करने की यह परंपरा पिछले अनेक वर्षों से चली आ रही है । उत्तरप्रदेश सरकार ने भी अमृतस्नान के लिए आए संतों पर हेलिकाप्टर से पुष्पवृष्टि की ।  
    अमृतस्नान का स्थानमाहात्म्य !
         समुद्रमंथन के पश्‍चात अमृतप्राप्ति के लिए देवासुरों में १२ दिन, अर्थात पृथ्वी के कालानुसार १२ वर्ष युद्ध हुआ । उसमें पृथ्वी पर ४ बार अमृतकुंभ रखा गया । जिन ४ स्थानों पर अमृतकुंभ रखा गया, वहां अमृतकण गिरे और वहां यह मेला प्रत्येक १२ वर्षों में लगता है । अमृतकणों की प्राप्ति के लिए होनेवाला यह स्नान अद्वितीय है । यह योग सामान्य श्रद्धालुआें के लिए पुण्यप्रद है । उसमें पापों का विमोचन करने की तडप है और मोक्षप्राप्ति की आस भी है । गंगामाता पाप का परिमार्जन करती है । उसमें संग्रहित पाप संतों के चैतन्य से नष्ट होता है; इसलिए श्रद्धालुआें से पहले सारे संत गंगा में स्नान करते हैं । राजयोगी स्नान के रूप में प्रसिद्ध यह प्रथम अमृतस्नान मकरसंक्रांति के दिन किया जाता है । इस पवित्र दिन लगभग १ करोड से अधिक श्रद्धालुआें ने गंगास्नान किया, तब नास्तिकतावादियों के लिए वह एक बडा तमाचा था । गंगा पर और उस गंगास्नान पर श्रद्धा रखनेवाले, उसके लिए रातभर जागनेवाले, १०-१५ कि.मी. पदभ्रमण करनेवाले श्रद्धालू भारत की आस्तिकता की परंपरा है । नास्तिकतादियों के कार्यक्रम में १०० लोग भी आना कठीन होता है, वहां यह आस्तिकता महत्त्वपूर्ण है ।  
    ऐसा यह अमृतस्नान का महिमा !
        पापों का परिमार्जन और मोक्षप्राप्ति यही गंगास्नान का मूल है । धर्मशास्त्र में कहा है कि जिसकी जैसी श्रद्धा होगी, वैसा उसे फल मिलता है । जो केवल कर्मकांड के रूप में स्नान करते हैं, उन्हें वैसा पुण्य मिलेगा । जो ऐरे गैरे हैं, उन्हें उसके अनुसार फल मिलेगा । पापी व्यक्ति को पापविमोचन की तडप होगी, तो उसे आत्मशांति मिलेगी और मोक्ष की तडप जिसे है उस मुमुक्षु को मोक्षप्राप्ति का मार्ग मिलेगा । ऐसी इस अमृतस्नान की महिमा है । उसके लिए होनेवाला यह स्नानार्थियों का मेला देखकर हमारा जीवन धन्य हुआ !  

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