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    मातृभाषा में सबके लिए समान और अनिवार्य शिक्षा का प्रश्न -डॉ. अमरनाथ

           आजकल सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम अपनाने का देश की अधिकाँश राज्य सरकारों में होड़ लगा हुआ है.  ऐसा क्यों न हो ? अंग्रेजी माध्यम के बल पर ही मात्र तीन प्रतिशत लोग सत्ता पर काबिज हैं. जबकि देश की आधी से ज्यादा आबादी द्वारा बोली जानो वाली हिन्दी हाशिए पर ठेल दी गई है.
    कहा जाता है कि यह निर्णय अभिभावकों की मांग पर लिया जा रहा है. अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की जगह अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाना पसंद कर रहे हैं. इस तरह सरकारी बांग्ला या हिन्दी माध्यम के स्कूलों में छात्र-संख्या घट रही है. यह सही भी है. एक अनुमान के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में ही हमारे बंगाल के शहरी क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत बांग्ला या हिन्दी माध्यम वाले स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या अंग्रेजी माध्यम में बदल चुके हैं. किन्तु इसके वास्तविक कारण तलाशने की जगह, सरकारें समूची प्राथमिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में बदलने की तैयारी कर रही है.
            
    जब चपरासी तक की नौकरियों में भी अंग्रेजी अनिवार्य होगी तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. यह एक ऐसा मुल्क बन चुका है जहां का नागरिक चाहे देश की सभी भाषाओं में निष्णात हो किन्तु एक विदेशी भाषा अंग्रेजी न जानता हो तो उसे इस देश में कोई नौकरी नहीं मिल सकती और चाहे वह इस देश की कोई भी भाषा न जानता हो और सिर्फ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी जानता हो तो उसे इस देश की छोटी से लेकर बड़ी तक सभी नौकरियाँ मिल जाएंगी. छोटे से छोटे पदों से लेकर यू.पी.एस.सी. तक की सभी भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का दबदबा है. कलकत्ता हाईकोर्ट में सारी बहसें और फैसले सिर्फ अंग्रेजी में होने का प्रावधान है. यह ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है जहां के नागरिक को अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी वकील को पैसे देना पड़ता है. मुकदमों के दौरान उसे पता ही नही होता कि वकील और जज उसके बारे में क्या सवाल-जबाब कर रहे हैं. ऐसे माहौल में कोई अपने बच्चे को अंग्रेजी न पढ़ाने की भूल कैसे कर सकता है ?
    सच यह है कि जबतक हमारी शिक्षा हमारी अपनी भाषाओं के माध्यम से नहीं होंगी तबतक गांवों की दबी हुई प्रतिभाओं को मुख्य धारा में आने का अवसर नहीं मिलेगा. आजादी के बाद इस विषय को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग आदि अनेक आयोग बने और उनके सुझाव भी आए. सबने एक स्वर से यही संस्तुति की कि बच्चों की बुनियादी शिक्षा सिर्फ मातृभाषाओं में ही दी जानी चाहिए. दुनिया के सभी विकसित देशों में वहां की मातृभाषाओं में ही शिक्षा दी जाती है. मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि अपनी मातृभाषा में बच्चे खेल- खेल में ही सीखते हैं और बड़ी तेजी से सीखते हैं. उनकी कल्पनाशीलता का खुलकर विकास मातृभाषाओं में ही हो सकता है. गाँधी जी चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सब कुछ मातृभाषा के माध्यम से हो. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा है, “ अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही हमारे लड़के और लड़कियों की विदेशी माध्यम के जरिये शिक्षा बंद कर दूं और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूं या उन्हें बरखास्त कर दूं. मैं पाठ्यपुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूंगा. वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी.”

                  
    गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के माध्यम विषय पर कहा हैं,” हमारा मन तेरह –चौदह वर्ष की आयु से ही ज्ञान का प्रकाश तथा भाव का रस प्राप्त करने के लिए खुलने लगता है. उसी समय यदि उसके ऊपर किसी पराई भाषा के व्याकरण तथा शब्दकोश रटने के रूप में पत्थरों की वर्षा आरंभ कर दी जाय तो बतलाइए कि वह सुदृढ़ और शक्तिशाली किस प्रकार हो सकता है ? ” उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा इंग्लैंड में अंग्रेजी माध्यम से हुई थी और उनके जीवन के प्रारंभिक आठ वर्ष यूरोप में ही व्यतीत हुए थे किन्तु, ‘विश्वभारती’ की माध्यम-भाषा उन्होंने बांग्ला को ही चुना. उन्होंने ही नारा दिया था, “बांग्ला भाषा बंगालीर आशा.” यूनेस्को का भी सुझाव है, “ बच्चे के लिए शिक्षा का सबसे बढ़िया माध्यम उसकी मातृभाषा है......शैक्षिक आधार पर वह मातृभाषा के माध्यम से एक अनजाने माध्यम की अपेक्षा तेजी से सीखता है.”( यूनेस्को,1953:11)     
           हमारे प्रधान मंत्री जी ने पिछले दिनों एक लाख करोड़ की लागत वाली जापान की तकनीक और कर्ज के बलपर जिस बुलेट ट्रेन की नींव रखी है उस जापान की कुल आबादी सिर्फ 12 करोड़ है. वह छोटे छोटे द्वीपों का समूह है. वहां का तीन चौथाई से अधिक भाग पहाड़ है और सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्से में ही खेती हो सकती है. फिर भी वहां सिर्फ भौतिकी में 13 नोबेल पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिक हैं. ऐसा इसलिए है कि वहां शत- प्रतिशत जनता अपनी भाषा ‘जापानी’ में ही शिक्षा ग्रहण करती है. इसी तरह कुछ दिन पहले उन्होंने जिस इजराइल की यात्रा की थी और उसके विकास पर लट्टू थे उस इजराइल की कुल आबादी मात्र 83 लाख है और वहां 11 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैं क्योंकि वहां भी उनकी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ में शिक्षा दी जाती है. हमारा पड़ोसी चीन उसी तरह का बहुभाषी विशाल देश है जिस तरह का भारत. किन्तु उसने भी अपनी एक भाषा चीनी ( मंदारिन) को प्रतिष्ठित किया और उसे वहां पढ़ाई का माध्यम बनाया. चीनी बहुत कठिन भाषा है. चीनी लिपि दुनिया की संभवत: सबसे कठिन लिपियों में से एक है. वह चित्र-लिपि से विकसित हुई है. आज चीन जिस ऊंचाई पर पहुंचा है उसका सबसे प्रमुख कारण यही है कि उसने अपने देश में शिक्षा का माध्यम अपनी चीनी भाषा को बनाया.  इसी तरह अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, रूस आदि दुनिया के सभी विकसित देशों में वहां की अपनी भाषाओं क्रमश: अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी आदि में ही शिक्षा दी जाती है. इसीलिए वहां मौलिक चिन्तन संभव हो पाता है. मौलिक चिन्तन सिर्फ अपनी भाषा में ही हो सकता है. व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु सोचता अपनी भाषा में ही है. हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में ट्रांसलेट करके सोचते हैं और लिखने के लिए फिर उन्हें दूसरे की भाषा में ट्रांसलेट करना पड़ता है. इस तरह हमारे बच्चों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है. अंग्रेजी माध्यम अपनाने के बाद से हम सिर्फ नकलची पैदा कर रहे हैं.
          
    जब अंग्रेज नहीं आए थे और हम अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते थे तब हमने दुनिया को बुद्ध और महावीर दिए, वेद और उपनिषद दिए, दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र दिए, चरक जैसे शरीर विज्ञानी और शूश्रुत जैसे शल्य-चिकित्सक दिए, पाणिनि जैसा वैयाकरण और आर्य भट्ट जैसे खगोलविज्ञानी दिए, पतंजलि जैसा योगाचार्य और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिए. हमारे देश में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे जहां दुनिया भर के विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे. इस देश को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था जिसके आकर्षण में ही दुनिया भर के लुटेरे यहां आते रहे.
           अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की मानें तो हमारे देश में पाँच करोड़ बाल मजदूर हैं यानी, पांच करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते. हमारे बंगाल में भी लाखों ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते. सबसे पहले उन्हें स्कूल भेजने की व्यवस्था होनी चाहिए, प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती होनी चाहिए, उन विद्यालयों में जरूरी संसाधन उपलब्ध होना चाहिए. शिक्षा का क्षेत्र आज भारी मुनाफे का क्षेत्र हो गया है. सबसे ज्यादा निवेश यहीं हो रहे हैं. इसपर अंकुश लगनी चाहिए और शिक्षा अपने पड़ोसी भूटान की तरह सरकारी नियंत्रण में होनी चाहिए.
     
    अंग्रेजी ही ज्ञान की भाषा है- यह बहुत बड़ा झूठ है. यह गलत अफवाह फैलाया जाता है कि उच्च शिक्षा (ज्ञान-विज्ञान-तकनीक) की पढ़ाई बांग्ला या हिंदी में नहीं हो सकती. जब चीन की मंदारिन (चीनी) जैसी कठिन भाषा में ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीक की पढ़ाई हो सकती है तो बांग्ला या हिन्दी में क्यों नहीं हो सकती?
            जिस अमेरिका और इंग्लैंड की अंग्रेजी हमारे बच्चों पर लादी जा रही है उसी अमेरिका और इंग्लैण्ड में पढ़ाई के लिए जाने वाले हर सख्स को आइइएलटीएस ( इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम ) अथवा टॉफेल ( टेस्ट आफ इंग्लिश एज फॉरेन लैंग्वेज) जैसी परीक्षाएं पास करनी अनिवार्य हैं. दूसरी ओर, हमारे देश के अधिकाँश अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में बच्चों को अपनी मातृभाषा बोलने पर दंडित किया जाता है और सरकार कुछ नहीं बोलती. यह गुलामी नहीं तो क्या है? बेशक गोरों की नहीं, काले अंग्रेजों की गुलामी.
     
    अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए निर्देश दिया था कि सरकार सुनिश्चित करे कि सरकारी खजाने या सार्वजनिक निधियों से किसी भी तरह का आर्थिक लाभ पाने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, जनप्रतिनिधि यानी, सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री तक के बच्चे प्राथमिक शिक्षा पाने की उम्र तक सरकारी विद्यालयो में ही पढ़ें. कोर्ट ने सरकार को छह महीने के भीतर इस फैसले को लागू करने का भी निर्देश दिया था, जिसे आज तक लागू नहीं किया गया. इसी तरह जी.डी.पी. का छह प्रतिशत शिक्षा के मद में खर्च करने का कोठारी कमीशन द्वारा दिया गया सुक्षाव भी आज तक अमल मे नहीं लाया गया. आज शिक्षा को सरकारी, गैरसरकारी, कारपोरेट, धार्मिक ट्रस्टों आदि के हाथों में सौंप दिया गया है जिनके द्वारा संचालित किसिम- किसिम की संस्थाओं में पाठ्यक्रमों से लेकर फीस तक सबकुछ मनमाना और अलग- अलग तरह का है.
    अब समय आ गया है कि देश की जनता सबके लिए समान और अनिवार्य तथा अपनी-अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा की माँग करे और यह तभी संभव होगा जब सरकारी नौकरियों से, न्यायपालिका और कार्यपालिका से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो. जाहिर है, यह लड़ाई भी साथ –साथ लड़नी होगी.

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